अमीर होने और अमीर दिखने में क्या अंतर है
जो 'होता' है, वो 'दिखता' नहीं है ।।
जो 'दिखता' है, वो 'होता' नहीं है ।।
जो व्यक्ति अपने आप को अमीर दिखाने की कोशिश कर रहा है, वो अमीर तो है ही नहीं । तभी तो दिखावा कर रहा है । और मज़े की बात यह है कि जितना दिखावा कर रहा है, उतना ही भीतर से खोखला है ।
अमीर तो अमीर है ।
उसे दिखावा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती ।
अगर दिखावा करता भी, तो किस के सामने?
एक कहानी याद आई....
उस समय दिलीप कुमार (मौहम्मद युसुफ) की तूति बोल रही थी, फिल्मी दुनिया में । कँही शूटिंग के बाद, वापस अपने वतन आ रहे थे। जिस हवाई जहाज में वे एक कोने वाली सीट पर बैठे थे, ठीक उनके दूसरी तरफ एक और महानुभाव बैठे हुए थे ।
जहाज़ में बैठा हर यात्री दिलीप साहब को उचक उचक कर देख रहा था। पूरी यात्रा के दौरान उस भले आदमी ने एक बार भी नज़र उठा कर दिलीप कुमार की तरफ नहीं देखा ।
दिलीप कुमार ने सोचा, निश्चित रूप से इस आदमी का दिमाग ठीक नहीं है । उन्हें बहुत बुरा लगा कि एक बार भी उस महानुभाव ने उनकी तरफ नज़र उठा कर नहीं देखा ।
जहाज़ अपने गन्तव्य पर पहुँचा । यात्री उतरने लगे, तो अहंकार पर चोट खाये दिलीप साहब ने सोचा ::::: चलते चलते इस भले आदमी को बता ही दूँ, मैं कौन हूँ ।। हाथ मिलाते हुए कहा -
"आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई, मैं दिलीप कुमार हूँ ।"
उसे व्यक्ति ने शांति से मुस्कुराते हुए जवाब दिया" मैं J.R.D. TATA हूँ "
'अमीर दिखना' और 'अमीर होना' इसमें क्या अंतर होता है?
हमारे नजरिए में सचमुच अमीर होना मतलब तो एक बेहतर कर्मयोगी ज्ञानयोगी होना है । यह अमीरी नेकी सेवा कर्म ज्ञान से समृध्द होने से आती है । दुनिया की कितनी भी पूंजी क्यों ना पास हो अगर इंसान कर्म से गरीब रहेगा तो जो अंदर ही अंदर खालीपन समाता है वह कभी इंसान को सुकून से जीने नहीं देता है । असली खुशी देने में होती है । असली तरक्की समाज के तरक्की से अपनी तरक्की करने में है । जीवन के अंत में अगर पीछे मूड़्कर देखा जाए तो अगर इंसान अच्छे कर्म से समृध्द है तो वह सुकून की नींद धर्ती के गोद में लेगा । इसका मतलब यह भी नहीं की कोई सज धज रहा है तो गलत कर रहा है । मगर किस चीजों को कब कितनी प्राथमिकता देना है यह इंसान को खुद तय करना पडेगा । दुनिया को दिखावा लगे तो भी अपने जीवन का उत्सव मनाना यह भी किसी इंसान को सही लग सकता है और उसे पूरी तरह हम गलत भी न मान सकते । हर एक के अपने अपने जीने के तरीके होते है । किसी एक परिमान को हम अगर गलत कहने लगे रोक टोक लगाए तो जीवन की खूबसूरती खो जा सकती है । विभिन्नता से विभिन्न सोच से भी इस संसार में कुछ न कुछ हद तक संतुलन बनता है । जब एक तरफ समाज में भूख गरीबी बेरोजगारी बढे और दुसरी तरफ शान शौकत हो तो अच्छे इंसान पहले समाज की तकलीफे कम करने में अपनी दौलत लगा देते है - क्योंकि दौलत का सबसे सही इस्तेमाल वह है । किसी इंसान की सच्ची अमीरी देखना है तो उसके दिल में झांको - उसका कर्म समझो । क्योंकि अक्सर फकीर लगने वाले इंसान दुनिया में अमीर होते है । क्योंकि ज्ञान सूझबूझ का गहरा समंदर अक्सर फक़ीर लगने वाले इंसानों के अंदर हो सकता है ।
अमीर, धनवान कैसे हो सकते है ?
आसान है । प्रकृती हमेशा खुले हाथों से देना चाहती है - बस हमें लेना आना चाहिए । दुनिया में करोड़ो लोग है जो आपको सहाय्यता करना चाहते है - पर पहले राह पे हमें खुद निकलना पड़ है । जितना दिल बड़ा करोगे प्रकृती यानि औरों को सहयोग करोगे दुनिया भी उतनी सहयोग करेगी । प्रकृती का व्यवहार लेन देन हमेशा दोनो तर्फा होता है । नेक कर्म ज्ञान की राह पे चलकर इंसान अमीर हो सकता है । जिसे जो अच्छा मिले वह लेते जीवन में आगे बढे देते चले । जिस इंसान का दिल इतना विशाल हो की उसे सारा संसार अपना घर लगे पूरी कायनात अपनी लगे उससे भला अमीर कौन हो सकता है । ऐसी अमीरी संत महात्माओ के पास होती है । अब इतनी अमीरी पहले से जब आती है तो भले वह दुनिया से क्या चाहेंगे ? फिर आसक्ती नहीं रहती । जीवन में मकसद की कमी रहना - यह इंसान को गरीबी की ओर लेके जाती है । अमीर होने का पहला कदम है - अपने अच्छे मकसद लक्ष्य तय करे और उस दिशा में कर्म करे ।
मन में अगर चाह हो तो राह मिल ही जाती है।

यह तो बिल्कुल सच बात है कि लोग ज्यादातर अमीर दिखना और दिखाने की कोशिश करते हैं, बाकी उनकी सबकी कहां-कहां से फटी होती है वह सामने से नहीं दिखता... जबकि आज की सच्चाई यही है
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